श्री राम और सेतु

(Publish on September 19, 2007 by Pawan at jaishreeraam.wordpress.com)

ये केवल हिन्दू धर्म की ही समर्थता है कि अपने अन्दर इतने गद्दार, विरोधी और आलोचकों के होते हुए भी कायम है। किसी और धर्म में यदि इतनी संख्या या प्रतिशत में आलोचक (अपने ही धर्म के) हो जाएं तो सोच कर देखिये कितने दिन वो धर्म चल सकता है? हमारा धर्म का सिर्फ नाम ही नहीं वास्तव में सनातन है।

 

एक अमरीकी समाचार संस्था कह रही है कि चार में से सिर्फ एक हिन्दू धर्म-परायण है। ये सुनकर पत्रकरो ने हल्ला काट दिया, चलो मान लिया सच है। लेकिन अमेरिका में चालीस में से एक नहीं मिलेगा जो धर्म-परायण हो। मगर अपने धर्म के अस्तित्व और आस्था पर प्रश्न उठाने वाला चार सौ में से एक नहीं मिलेगा। लेकिन हमारे धर्म में आलोचकों की भरमार है और यह हमारा गुण है (आजकल तो फ़ैशन भी है)।(इन अंग्रेजी भाषियों ने पहले धर्म-परायण ईसाई लोगों को Orthodox Christian कह कर पुकार और आज कहते हैं कि Orthodox का मतलब रूढीवादी या कट्टरवादी होता है। क्योंकि Orthodox लोग ज्यादातर रूस (भूतपूर्व सोविय संघ) और दक्षिणी-पूर्वी यूरोप में रहते हैं। अंग्रेज लोग अपनी जरूरत के अनुसार अंग्रेजी शब्दों के अनुवाद क्षेत्रीय भाषा में करते हैं। आज ये प्रचार कर रहे हैं कि चार में से एक हिन्दू धर्म परायण है, कल या आज ही किसी दूसरी जरूरत पड़ने पर कहेंगे कि चार में से एक हिन्दू कट्टरवादी है।)  

 

हमारा धर्म हमें वास्तव में स्वतंत्रता देता है कि हम जितना चाहें इसका विरोध अपमान या आलोचना करें। लेकिन कोई दूसरे धर्म का व्यक्ति हमारे धर्म पर प्रश्नचिह्न लगाए, आलोचना करे, हमारी आस्था पर चोट करे ये बर्दास्त करने लायक नहीं है। चाहे झगड़ा पुल का ही क्यों न हो। अपना आदमी चाहे कितनी भी आलोचना करे अपना ही है। जो गाय दूध देती है वो अगर लात भी मारे तो बुरा नहीं मानना चाहिए। अपनी औलाद नालायक भी हो जाए, फिर अपनी ही रहेगी।

 

कृष्ण ने भी बहुत आलोचना की मगर क्या हुआ? उन्होने मूर्ति और देवता पूजा का विरोध किया, लोगो ने उन्हीं की मूर्ती बना कर पूजा करनी शुरु कर दी। उन्होने देवताओं के स्थान पर गाय, पेड़ और पर्वत की पूजा करने को कहा तो लोगों ने गाय, पेड़ और पर्वतों को ही देवता घोषित कर दिया परिणाम क्या निकला? हिन्दू धर्म के देवी-देवताओ की संख्या और बढ़ गई। हमारा धर्म आलोचकों से नहीं डरता। आलोचक बुद्ध हुए, महावीर हुए कृष्ण से पहले भी बहुत से अष्टावक्र जैसे ॠषि हुए थे जिन्होने हमारे कर्म-काण्ड और बहुदेवतावाद का बड़ा विरोध किया, आदि गुरु शंकराचार्य जी ने भी अपने आधे जीवन में इन सब बातों का समर्थन और फिर आधे जीवन विरोध किया, क्या इन सबके विरोध या आलोचनाओं सें हमारे धर्म का कुछ घटा? हमारे धर्म पर कोई फ़र्क पड़ने वाला नहीं। हमने उल्टा, इन्हीं सब को देवता कह कर पूजना शुरु कर दिया।

 

बुद्ध जैसा नास्तिक आज ढूंढना मुश्किल है, जो देवी-देवता ही क्या परमपिता परमेश्वर (निराकार) में भी विस्वास नहीं करता था, अपने प्रचारों से हमारा कुछ न बिगाड़ सका। बुद्ध के प्रचार के परिणाम स्वरूप हमरे धर्म में कुछ कट्टरपंथी पैदा हुए, हमारा धर्म और सुरक्षित हुआ और मजबूत हुआ। लेकिन बौद्धो को इससे बड़ा नुक्सान झेलना पड़ा। (लोग उनकी पूजा करते हैं और स्वयं को उनका अनुयायी कहते हैं, है न मज़ाक? जब बुद्ध ने देवता, भगवान् या ईश्वर वाले सिस्टम को माना ही नहीं तो वो स्वयं भगवान् कैसे हो सकते हैं। हिन्दु धर्म के अनुसार तो वो भगवान् हैं, लेकिन उनके बौद्ध अनुयायियों को तो बुद्ध के उपदेशों का अनुसरण करना चाहिए अर्थात् बुद्ध को भगवान् नहीं मानना चाहिए।

 

आप अपने चारों ओर देखिए हिन्दुओं की धार्मिक सक्रियता (पूजा-अनुष्ठान, तीर्थ-मन्दिर यात्रा) बढती ही जा रही है। क्योंकि हमारा धर्म वास्तव में सनातन हैं और सनातन रहेगा।

 

आपने डिस्कवरी या एन॰ जी॰ सी॰ वगैरह टी॰ वी॰ चैनलों पर बाइबॅल (नई/पुरानी) या ईसा मसीह के ऊपर बहुत डॉक्यूमेन्टरी देखी होंगी। क्या कभी आपने ऐसा कुछ देखा है जिससे ईसाई, यहूदी या इस्लाम धर्म की किसी मान्यता या कहानी का खण्डन होता हो? इन तीनों के धर्म-ग्रथों में लिखी कोई बात झूठी सिद्ध होती हो? या कोई प्रश्नचिह्न खड़ा होता हो? हिन्दू धर्म की मान्यताओं और इससे जुड़े लोगों की ये जम कर धज्जियां उड़ाते हैं। इस्लाम धर्म को ये लोग छूने से डरते हैं, इसलिए न अच्छा और न बुरा पक्ष दिखाते है। पिछले साल पॉप की इस्लाम पर की गई एक टिप्पणी से पूरी दुनिया में बवाल हुआ। कुरआन का सबसे पहला अंग्रजी अनुवाद 1648 ई॰ में हुआ। मतलब लगभग एक हजार साल बाद जबकि हिन्दुओं ने इसका अनुवाद हिन्दी में 813 ई॰ में ही कर लिया था। इससे इस्लाम के प्रति ईसाईयों का डर स्पष्ट दिखाई देता है।

 

ये चैनल यहूदी और ईसाई धर्म की मान्यताओं के समर्थन में अनेक वैज्ञानिक सिद्धान्त और कहानियों से महिमा मण्डन और समर्थन में तर्कों के ढेर लगा देते हैं। हालांकि कई बार यहूदी धर्म की कुछ बुराइयों {केवल ईसा मसीह के समकालीन (कारण आप जानते ही हैं)} को भी दिखाते हैं लेकिन उनकी पुरानी मान्यताओं और आस्था को सदैव सत्यापित करते रहते हैं, ऐसा इसलिए कि यहूदी धर्म के अस्तित्व से ही ईसाई धर्म का अस्तित्व है। यहूदियों के धर्म ग्रंथ बाइबॅल में लिखा है कि मसीहा धरती पर आयेगा, इसलिए यहूदियों को मसीहा का बेसब्री से इन्तजार है। लेकिन ईसाई लोग दावा करते हैं कि ईसा मसीह वही मसीहा है जिसका यहूदियों की बाइबॅल में जिक्र है। इस लिए ईसाई लोग यहूदियों के बाइबॅल (पुरानी) की सभी (अन्य) बातों को प्रमाणित करने का प्रयास करते रहते हैं। अपने धर्म ग्रंथ “नया नियम” को भी बाइबॅल कह कर प्रचारित करते हैं। (ईसाई लोग यहूदियों की बाइबॅल को अपनी बाइबॅल यानि नया नियम के साथ एक जिल्द में भी प्रकाशित करते हैं।) 

मूसा ने मिश्र से इजराइल भागते समय, यहोवा के वचनानुसार जब समुद्र के आगे लाठी उठाई तो, तेज और लगातार बहने वाली पवन ने समुद्र के पानी दो तरफ हटा दिया, बीच में रास्त बन गया, पानी रास्ते के दायीं और बायीं ओर दीवार की तरह खड़ा हो गया। फिर पूर्वी पवन ने जमीन सुखा दी। मूसा ने अपने लोगों के साथ समुद्र की सूखी जमीन पर चल कर समुद्र पार किया। उनका पीछा करते हुए जब सैनिक (मिश्र के) समुद्र पार कर रहे थे, उस समय मूसा ने समुद्र के दूसरी ओर जाकर फिर लाठी ऊपर उठाई तो पानी वापस आ गया और सारे सैनिक मर गए। किस तरह से डिस्कवरी वाले इसकी वैज्ञानिक सिद्धान्तों से पुष्टि करते है ये देखने लायक होता है।

 

हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार समुद्र में रास्ता बनाने के लिए भगवान् राम ने भी समुद्र के आगे लाठी तो नहीं लेकिन अपना धनुष जरूर उठाया था। लेकिन समुद्र ने रास्त नहीं दिया, इस कार्य को पर्यावरण के लिए हानिकारक बताया। इस लिए माफी मांग कर पुल बनाने का सुझाव दिया। क्योंकि राम पर मूसा जैसी विपत्ति नहीं थी (क्योंकि मूसा का तो सैनिक पीछा कर रहे थे, लेकिन राम स्वयं हमला करने जा रहे थे)। जिस पवन ने हनुमान जी की सहायता लंका दहन में की थी, वो भी राम की सहायता के लिए नहीं आये (हालांकि बाईबलानुसार पवन ने ही मूसा के लिए लाल सागर में रास्ता बनाया था)। समुद्र ने राम को पुल बनाने के लिए अनुकूल स्थान, मार्ग (क्योंकि समुद्र के अन्दर का हाल उनसे ज्यादा और कौन बता सकता था) तथा योग्य इंजीनियर नल-नील सुझाए। राम ने समुद्र के सुझाव के अनुसार पुल बनाया। यदि मूसा की कहानी सच्ची है, तार्किक है, वैज्ञानिक सिद्धातों से सिद्ध होती है तो राम की कहानी में भला किसी को क्या आपत्ति है। (करुणा जी कह रहे थे कि “क्या राम इंजीनियरिंग पढी थी?”, राम ने तो इंजीनियरिंग पढी थी, लेकिन करुणा जी ने रामायण ही क्या हिन्दुओं का कोई ग्रंथ नहीं पढ़ा और तेरे नाम फिल्म भी नहीं देखी वर्ना ऐसा प्रश्न नहीं करते। तेरे नाम फिल्म में भी गुरगृहँ गए पढ़न रघुराई। अलप काल बिद्या सब आई॥” कहा (जपा) गया है। उस युग में गुरुकुल में 64 विद्याए पढाई जाती थी। उसमें स्थापत्य और इंजीनियरिंग वगैरह सब कुछ पढाया जाता था। इसके अलावा समुद्र देव ने पुल बनाने में माहिर नल-नील का पता तो राम को बता ही दिया था और जैसा कि सब जानते हैं कि नल और नील की सहायता से ही पुल बना था। अगर मूसा की तरह राम के लिए भी यदि पवन से रास्ता बना दिया होता तो आज न ये पुल होता और न इसका रगड़ा-झगड़ा) 

 

ये (अन्य धर्म) हम लोगों (करुणा जी) की तरह अपने धर्म या धार्मिक ग्रंथों का विरोध नहीं करते। इनकी सारी फिल्में, डॉक्यूमेंट्री यह सिद्ध करती हैं कि इनके धर्म और मिथक कथाओं में सब कुछ सच है। इन्होनें कभी अपनी इस धार्मिक मान्याता का जिक्र नहीं किया कि हमारी सृष्टि केवल छः हजार साल पुरानी है। क्योंकि इसके पक्ष में तो मुल्ला नसीरुद्दीन भी तर्क नहीं दे सकते। लेकिन ये इन्होंने सिद्ध करके दिखा दिया है कि धर्मिक सेना की छोटी-सी पीपनी बजाने से दुश्मन के किले की दिवार गिर जाया करती थी।

 

आपने शायद सुना हो, पिछली बार जब अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव हुए थे, उस चुनाव प्रचार की बहस में एक बात खबरों में आई थी कि बुश और उसका निकटतम प्रतिद्वंद्वी जॉन केरी, दोनो अपने विद्यार्थी जीवन में किसी एक ही प्रतिबन्धित संस्था (मासोन) के सदस्य थे। दोनों ने कैमरे के आगे स्वीकार किया। लेकिन इसका कोई ज़िक्र नहीं हुआ कि कोन-सी संस्था? बाद में इनसे अकेले में विशेष पत्रकार ने पूछा (कैमरे के आगे, और कैमरा कभी अकेला नहीं होता), कोई जवाब नहीं दिया केवल मुस्करा दिये। क्योंकि उस संस्था का नाम उजागर होने से ईसा मसीह पर मंडित, तथाकथित छवि पर खतरा है। हालांकि मासोन भी ईसाई ही हैं (डेन ब्राउन की “द विंची कोड” के “ओपुस देइ” की तरह)। किसी जमाने में इसी संस्था (हमेशा से प्रतिबंधित) में आस्था रखने वालों के द्वारा संस्था के आदर्शों को ध्यान में रखते हुए अमेरिकन डॉलर (एक का नोट) डिजायन किया गया था (एक का डॉलर जो आम चलता है)।

 

कहने मतलब ये है कि अपने-अपने धर्म की कमजोरी (असंगत या विवादास्पद बात) सब जानते हैं लेकिन वो हिन्दुओं की तरह उसका प्रचार नहीं करते। बल्कि अपनी कमजोरी को छुपा कर रखते हैं और खुल जाने पर अपनी विशेषता बताते हैं। हमारे शास्त्रों में लिखा है कि ये (धर्म का) ज्ञान उसी को दें जो पहले से ही अमुक देवता या ग्रंथ विशेष प्रति आस्थावान हो, नास्तिक को ज्ञान न दें (गीता)। परधर्मी तो बहुत दूर की बात है, परशिष्य को भी धर्म का ज्ञान देना मना है। हमारी परम्परा धर्म प्रचार की नहीं है।

 

प्राचीन काल में हिन्दू धर्म कई दूर देशों में गया लेकिन हम इसे लेकर नहीं गए थे। दूर देशों के लोग ही यहां आकर हमारे धर्म से प्रभावित हुए और इसका प्रचार अपने देश में किया। मुहम्मद साहब और ईसा मसीह भी भारत की यात्रा के बाद ही सफल हुए। लेकिन इन दोनों कि भारत यात्रा को ये लोग प्रचारित नहीं करते। वे अपने जन्म-जात धर्म से प्रताड़ित थे और नये धर्म की स्थापना करना चाहते थे। उनकी भारत यात्रा पूरी तरह से सुनियोजित थी। ये यात्रा उन्होने अपने उद्देश्य के लिए ही की थी। इसलिए उन्होनें हिन्दू धर्म या भारत यात्रा का प्रचार अपने देशों में नहीं किया। (बाइबॅल यहूदी भाषा हिब्रू में लिखी गई, भारत को होदू लिखा गया है। इजरायल प्रवास में मुझे पता चला कि आज भी ये लोग हमें होदी और हमारे देश को होदू कहते हैं। मान्यता है कि नया नियम सबसे पहली बार ग्रीक भाषा में लिखा गया। लेकिन ये ग्रीक वाली बाइबॅल तीसरी शताब्दी में रोम के राजा कोंस्तानतीन की प्रेरणा से विशेष रूप से संकलित और सम्पादित की गई थी जिसका उद्देश्य रोम के गृहयुद्ध को शान्त करना था, इसलिए ग्रीक  (यूनानी भाषा) का ठप्पा जरूरी था। वर्ना ईसा मसीह के हिब्रू Hebrew-Aramic भाषी अनुयायी भला ग्रीक में नया नियम क्यों लिखते या लिखवाते? इजराइल के लोग तो पाँच हजार साल से आज तक, एक ही भाषा और लिपि का प्रयोग करते आ रहे हैं।)

 

जिन दिनों मैं आस्ट्रिया में रह रहा था, एक दिन मैं एक पुराने कथोलिक Catholic चर्च में गया, वहाँ प्राचीन चित्रों द्वारा समझाया गया था कि किस तरह इन्होंने दूसरे देशों में चुपके से बीमारियां फैलाईं और फिर देव दूत के रूप में नाव से उन देशों में गये और बीमार लोगों का इलाज किया। उन्हें ईसाई बनाया। आज यही काम भारत और भारत जैसे देशों में हो रहा है लेकिन नाव की जगह हवाई जहाज ने ले ली हैं। 

 

ऐसे समय में हमारे धर्मनिर्पेक्ष नेता लोग राम जैसे लोकप्रिय भगवान् के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। भगवान् राम सिर्फ भारत नहीं बल्कि विश्व में लोकप्रिय हैं, जाने-अंजाने विश्व के सभी धर्मों में राम का स्थान है। दिल्ली के पाँच “रामनगर” को मैं जानता हूँ, दुनिया भर में राम के नाम पर शहर हैं। लोग कहते हैं “राम कसम”, “राम दुहाई”, “राम राम”, “राम राज्य”, “राम का नाम लो”, “राम के नाम पर दे दो”, “राम जाने”, “राम भरोसे”, “राम का नाम सत्य है”, “राम करे अइसा हुइ जाए मेरी निन्दिया॰॰॰”, “राम नाम जपना पराया माल अपना” “राम तेरी गंगा मैली हो गई”, “राम लड्डू”, और न जाने क्या-क्या। क्या हिन्दुओं का एक राम ही भगवान् है? विष्णु कसम, कृष्ण का नाम लो या शंकर तेरी गंगा मैली हो गई क्यो प्रसिद्ध नहीं? जब अपने आस-पास देखो तो हर तरफ राम का नाम है। आम बोल-चाल में राम शब्द ईश्वर का प्रयाय है। इतना लोकप्रिय होते हुए भी राम के भक्तों की कमी है।

 

ध्यान से देखें- कृष्ण भक्त, शिव भक्त, हनुमान भक्त, किसी देवी के भक्त, गणेश भक्त, खांटू बाबा, सांई बाबा और न जाने कौन-कौन से बाबा के भक्त आपने देखे होंगे, लेकिन आज तक आपने कितने राम भक्त देखे हैं? आपने जान-पहचान के लोगों को- वैष्णो देवी, हरिद्वार, केदार, बद्री, अमर नाथ, मथुरा, वृन्दावन, खांटू और न जाने कौन-कौन-से तीर्थ जाते सुना होगा। आप कितने लोगों से मिले हैं जो तीर्थ करने अयोध्या जाते हैं? तो फिर अयोध्या में जनता कैसे इक्कठी हो गई थी? मैं नहीं समझता कि अयोध्या कांड मथुरा और बनारस से ज्यादा जरूरी था। लेकिन नेता लोग जानते थे कि केवल राम के नाम पर ही जनता भड़क सकती है, इक्कठी हो सकती है। अयोध्या कांड पूरी तरह से राजनैतिक था, नेताओं ने लोगो की भावनाओं को कैश किया। नेताओं ने राम नाम जप कर खुद को लोकप्रिय किया और आज भी कर रहे हैं। राम के बाद लोकप्रियता में भगवान् शंकर का नम्बर आता हैं, फिर देवी, तब कृष्ण और हनुमान जी का।

 

लेकिन कुछ लोग जो राम के अस्तित्व के तर्क में उनका समय ६ हजार वर्ष पुराना बताते हैं, यह गलत है। जहां तक मैंने पढ़ा है, राम शायद लाखों वर्ष पूर्व हुए थे। लेकिन क्या जरूरी है कि उनका अस्तित्व सिद्ध किया जाए? मैं समझता हूँ कि उनका नाम ही प्रयाप्त है, उनके नाम का अस्तित्व ही काफ़ी है।

 

यह सिद्ध करना कोई जरूरी नहीं है कि सेतु राम का बनाया हुआ है या नहीं। क्योंकि हो सकता है कि राम के बनाये गए सेतु का कोई सबूत न बचा हो, नष्ट हो गया हो। और जो सेतु वहां है वो पहले भी था (प्राकृतिक), इसीलिए समुद्र ने राम को वहां सेतु बनाने के लिए कहा था।

 

जहां तक सेतु तोड़ने का सवाल है; इटली और दुनिया के कई देशों नें प्रयावरण की सुरक्षा के लिए मूँगे की खुदाई (खुरचाई) रोक दी है। मूँगे के लिए समुद्र की तह को थोड़ा-सा खुरचना पड़ता है, लेकिन सेतु हटाने के लिए समुद्र में क़यामत लानी होगी। यहां राम का तो कोई सवाल ही नहीं है, चलो अगर यह भी मान लें कि बना हुआ सेतु प्राकृतिक है। इस स्थिति में, प्रयावरण की सुरक्षा को देखते हुए, सेतु तोड़ने का विचार छोड़ देना चाहिए।

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