समाचारों में बोला और लिखा जा रहा है….
1. मुम्बई हमलों के “सिलसिले में गिरफ़्तार” मोहम्मद अजमल अमीर क़साब….।
2. लश्कर-ए-तैबा के “कट्टरपंथी नेता”….।
3. जमात-उद-दावा “चरमपंथी संगठन”….।
4. अजमल अमीर क़साब वह एकमात्र “कथित” चरमपंथी है जो मुंबई “हमलों के बाद” पकड़ा गया….।
ऊपर लिखे चारो उदाहरण विश्व की सर्वश्रेष्ठ या सबसे भरोसेमंद समाचार संस्था के एक हिन्दी समाचार से लिए गए हैं।
जबकि “इस्लामवादी आतंकवदियों” इन हमलों में हमको यह साफ-साफ दिखा दिया कि हमलावर “इस्लामी आतंकवादी” थे और- ईसाई, यहूदी तथा हिन्दू उनका निशाना थे।
लेकिन हमारी सरकार, नेता और समाचार माध्यम (टी॰ वी॰, रेडियो, और प्रेस वाले) न जाने कब तक मुस्लिम आतंकवाद को “संगठन, गुट, कार्यकर्ता, नेता, हमलावर, कट्टरपंथी, अपहर्ता, आक्रमणकारी, बम विस्फोट करने वाले, बन्दी बनाने वाले अपराधी, अतिवादी, चरमपंथी, लड़ाके, गुरिल्ला, बन्दूकधारी, उग्रवादी, आपराधिक घटनाओं को अंजाम देने वाले, विद्रोही, अलगाववादी” और न जाने क्या क्या कहते रहेंगे। हद तो बहुत पहले हो गई थी, अब तो हद की भी हद हो गई।