विकास या उद्धार
क्या हम वास्तव में विकासशील हैं? धर्मेन्द्र, जितेन्द्र, अमिताभ, विनोद खन्ना, राज कुमार, राकेश रौशन, पृथ्वीराज कपूर, राज कपूर, मुकेश, किशोर, रफ़ी, दारा सिंह, हेमा मालिनी, माला सिंहा, सुचित्रा सेन, मुमुन सेन, नूतन, राजीव इन सब में से किसकी औलाद इनसे खूबसूरती या योग्यता में बेहतर हैं? क्या सतयुग से त्रेता और त्रेता से द्वापर और द्वापर से कलयुग बेहतर है? यदि नहीं तो कहां विकास हो रहा है? (फिल्मी दुनिया का उदाहण इसलिए दिया क्योंकि फिल्मी दुनिया का हाल किसी से छिपा नहीं)
प्रकृति का पहला नियम है “परिवर्तन” लोग भ्रम वश इसे “विकास” समझ बैठते है।
दोष हमारा नही है, क्योंकि विकास तो कभी हुआ ही नही और न ही हो सकता है। यदि विकास हो रहा होता तो पहले कलयुग, फिर द्वापर, फिर त्रेता और फिर सतयुग आता। केवल सतयुग तक ही इस संसार का विकास हुआ था। पहला अवतार जलचर फिर उभयचर (जलचर/स्थलचर=कछुआ) फिर पशु फिर मनुष्य+पशु (नृसिंह) फिर नाटा मनुष्य फिर विकसित मनुष्य (ब्राह्मण) के रूप में अवतार हुआ।
जैसे-जैसे संसार में विकास हुआ वैसे-वैसे भगवान् भी विकसित अवतार लेते रहे।
सतयुग के बाद भगवान भी अधोगामी हो गए। ब्राह्मण के बाद क्षत्रिय और फिर वैश्य और उसके बाद नास्तिक रूप में भगवान आए। सुना है कि अगली बार शूद्र परिवार में जन्म लेने का विचार है। इसे आप विकास नहीं कह सकते अगर, हाँ यदि बहुत सकारात्मक दृष्टिकोण से देखें तो इसे उद्धार कह सकते हैं। इस संसार का विकास नहीं बल्कि उद्धार हो रहा है।