जन्म स्थान
ईसा मसीह
मसीहाओं (पैगम्बर-अवतार) के जन्म तो विवादित (अपवादित) होते ही हैं। लेकिन, मसीहाओं के जन्म स्थान तो और भी भयंकर होते हैं; हमेशा विवादों में रहते हैं। मैं येरुसलम में होते हुए भी ईसा मसीह के जन्म स्थान “बेथलहेम“ (Bethlehem) को देखने नहीं जा सका। येरुसलम एक बहुत छोटा-सा (एक मुहल्ले के बराबर) शहर है, बेथलहेम इससे ७-८ किलोमीटर है। सूर्यास्त की रौशनी में पूरा जेरुसलम सोने का बना दिखाई देता है। क्योंकि शहर के सभी मकान एक ख़ास पत्थर से बने हैं। सरकारी कानून के मुताबिक उस पत्थर को हर इमारत की बाहरी दीवार पर लगाना जरूरी है। यह पत्थर दिन में साधारण दिखाई पड़ता है, लेकिन शाम को सुनहरा हो जाता है। इसलिए सैलानी दिन में शहर घूम कर शाम को शहर से बाहर पहाड़ी पर जा कर सुनहरा-शहर देखते हैं। मैं जब येरुसलम में था उन दिनो सफाई कर्मचारी हड़ताल पर थे, विलिंग वाल (क्राईंग वाल, दीवार जो येरुसलम में सबसे विवादित है) के अलावा शहर का नजारा भयंकर था। इसलिए मैं पहाड़ी पर ३-४ बजे ही पहुंच गया, फिर भी बेथलहेम नहीं गया। क्योंकि मेरा इजरायली मित्र उस स्थान से इतना डरता था कि मुझे वहां ले जाने को तैयार ही नहीं हुआ। आज मुझे पक्का हो गया कि वो सही था। मैंने ऐसे बहुत-से लोगों से पूछा जो तीर्थ करने येरूसलम गये थे- “जन्म स्थान देखा?” सबने मना कर दिया।
आप आज (१० नवम्बर २००८) की ख़बर देखिये, आज ऐसा दृष्य ईसा मसीह के जन्म स्थान पर था जैसा की उनका इतिहास है। ग्रीस और आर्मेनिया के चर्च (पुजारी) आपस में भिड़े हुए थे। पुलिस बीच-बचाव कम और अपना हाथ ज्यादा आजमा रही थी। झगड़े का विषय था- प्रार्थना का समय। एक ही प्रभु के दो अनुयायी, उसी प्रभु की पूजा के लिए खून-खराबा कर रहे हैं।
कुंभ के मेले में भी नागा लोग पहले नहाने के लिए झगड़ा करते हैं। बहुत दुःख होता है। सिया-सुन्नी भी लड़ते हैं यह भी दूसरी बात है। क्योंकि ये लोग पूजा करने के लिए नहीं लड़ते, इनके झगड़े व्यक्तिगत, पूजा पद्धत्ति या साम्प्रदायीक कारण से होते हैं। ग्रीस और आरमेनियन चर्चों की भी पूजा पद्धत्ति भिन्न हैं, लेकिन पूजा स्थान तो एक ही हैं और, शायद दोनों ही ऑर्थोडॉक्स भी हैं। ईसाई धर्म की मुख्य तीन शाखाएं “कॆथोलिक, प्रॉटस्टॆन्ट व ऑर्थोडॉक्स“ हैं। इन मुख्य शाखाओं के अतिरिक्त इनके बहुत-सारे चर्च (क्षेत्रीय पूजा पद्धत्ति) हैं। झगड़ा आम तौर से चर्चों में होता है। येरुसलम में छः चर्च बहुत सक्रीय हैं, जो आपस में अन्य पूजा-स्थलों के लिए भी लड़ रहे हैं। इनकी लड़ाई के चलते पूजा-स्थलों के विकास और मरम्मत का काम नहीं हो पा रहा है, जोकि अत्यन्त आवश्यक है। इनमें से कोई एक-दूसरे पर विश्वास कर के राजी नहीं इसलिए ऐसे पूजा स्थल भी हैं जिसकी चाबी मुस्लमान लोगों के पास रहती है।
मसीहा के जन्म स्थान पर पूजा का झगड़ा तो ऐसा हुआ जैसा कि छींटे लगवाने के लिए मंहदीपुर बालाजी की लाईन में लगे दर्शनार्थी भी नहीं करते। मिट्टी के तेल, राशन की चीनी और थैली या बोतल वाले दूध की लाईन में भी नहीं हुआ करता था। ये झगड़ा कुम्भ के मेले वाले नागाओं से बहुत मिलता-जुलता था, इसलिए देखते ही इलाहाबाद वाला कुंभ का मेला याद आ गया। मसीहाओं के जन्म स्थान बात चली तो इस्तानबूल (कोंस्तोनतीनोपल) का तोपकापुर संग्रालय भी याद आ गया।
इस संग्रालय में मैंने मुहम्मद साहब की तलवार, धनुष और उनकी बहुत-सी चीजों के साथ-साथ मक्के का दरवाजा (पल्ले) भी देखा था। जब तुर्कों (आत्मन्) ने मुहम्मद साहब के जन्म स्थान को जीता तो बाकि सामानों के साथ-साथ वहां की किवाड़ें भी ऊखाड़ लाए (हज़ के समय मक्का के जिस कमरे का तीर्थ-यात्री चक्कर लगाते हैं, उसका दरवाज़ा)।
राम और कृष्ण के जन्म स्थान का हाल तो आप लोगों से छिपा नहीं।