देवनागरी
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देवों की नगरी से ऊतरी हुई लिपि है, इसीलिए इसका नाम देवनागरी हुआ।
कोई भी लिपि भाषा विशेष के लिए होती है, अन्यथा हमारी लिपि को संसार की सबसे समर्थ लिपि कहा जा सकता था। दुनिया की बहुत-सी भाषाओं में प्रयोग किये जाने वाले बहुत सारे व्यञ्जन और स्वरों को देवनागरी द्वारा लिपिबद्ध नहीं किया जा सकता, लेकिन इसके उपरान्त भी हमारी लिपि का दुनिया में कोई सानी नहीं है। हालांकि बचपन में मैंने सुना था कि देवनागरी से दुनिया की किसी भी भाषा का कोई भी उच्चारण लिखा जा सकता है, लेकिन दुनिया घुमने पर ये भ्रम टूट गया। अन्य भाषाओं में कुछ ऐसे स्वर और व्यञ्जन हैं जिन्हें हम ठीक से सुन ही नहीं सकते लिखना तो बहुत दूर की बात है। जब हम उन्हें सुनते हैं तो हिन्दी का नजदीकी (मिलता-जुलता) कोई दूसरा अक्षर सुनाई देता है।
जब हम किसी वस्तु से व्यवहार करते हैं तो उसके गुण-दोष सामने आते हैं। देवनागरी के गुणों का जितना भी बखान करें कम हैं। हाँ, मुझे अब तक दो कमियां देवनागरी में दिखी हैं, पहली कमी है “ई” के ऊपर की मात्रा जोकि बिल्कुल र् जैसी है (र् + इ = र्इ)। दुसरी कमी है छोटी इ की मात्रा (“ि”) जोकि आगे (पीछे) से लगती है। यह दो इसके आधारभूत दोष है, इनको बदलना बहुत जरूरी है।
ख़ैर जो भी हो, जहां तक मैंने देखा देवनागरी से बेहतर भी कोई नहीं। मैंने इसे जितना समझा है उतना बताने की कोशिश करूंगा।
इसमें कुल ५२ अक्षर हैं, जिसमें १४ स्वर और ३८ व्यंजन हैं।
इस लिपि की एक अच्छी खूबी यह है कि स्वर और वञ्जनों की वर्णमाला में अलग-अलग व्यवस्था (क्रम) है।
अंक –
० १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९
0 1 2 3 4 5 6 7 8 9
स्वर –
स्वर – अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ अं अः
A Ā I Ī U Ū E AI O AU Ắ Ah
मात्रा – (ऽ) ा ि ी ु ू े ै ो ौ ं ः
~a ~ā ~i ~ī ~u ~ū ~e ~ai ~o ~au ~n ~h
स्वर – ऋ ॠ ऌ ॡ
ŖĬ ŖĬ ĻŖĬ ĻŖĬ
मात्रा – ृ ॄ ॢ ॣ
~ŗĭ ~ŗĭ ~ļŗĭ ~ļŗĩ
स्वर – ऍ ऎ ऑ ऒ
É Ǽ Ŏ AŎ
मात्रा – ॅ ॆ ॉ ॊ
~é ~ǽ ~ŏ ~aŏ
व्यञ्जन {हलन्त “्” लगने पर ये “शुद्ध व्यञ्जन” (क+्=क्) बनेंगे।}
क वर्ग – क ख ग घ ङ
(कण्ठ) – ka kha ga gha ña
च वर्ग – च छ ज झ ञ
(तालु) –cha chha ja jha ňa
ट वर्ग – ट ठ ड ढ ण
(मूर्धा) – ta tha da dha ńa
त वर्ग – त थ द ध न
(दांत) – ta tha da dha na
प वर्ग – प फ ब भ म
(होठ) – pa pha ba bha ma
य (तालु) र (मूर्धा) ल (दांत) व (होठ)
ya ra la va
श (तालु) ष (मूर्धा) स (दांत) ह (कण्ठ)
sha śa sa ha
विसर्ग (ः) ~h का उच्चारण नाभी से आरम्भ होता है।
क्ष (क्+ष) त्र (त्+र) ज्ञ (ज्+ञ)
kśa tra jňa(gya)
ड़ ढ़ ळ
rda(D) rha ld
ॐ = Aum (Om)
स्वर ऊँचा (दीर्घ या लम्बा) करने के लिए “॑” और स्वर नीचा (छोटा या कोमल) करने के लिए “॒” का प्रयोग होता है।
शुद्ध अक्षर पर मात्रा लगती है— क् + ी = की (क+ी=की)
अक्षरों की संधि भी इसी प्रकार होती है— त् + र = त्र (त+र=त्र)
सन्ध्यक्षर का केवल अंतिम व्यञ्जन ही स्वर सहित हो सकता है— द् + ध = द्ध।
जब “र“ की किसी अन्य अक्षर से संधि होती है तो इसका रूप बिलकुल ही बदल जाता है। यदि र पहले होतो र् होकर अगले अक्षर “क“ के ऊपर “र्क“ और “ख“ के ऊपर “र्ख“ हो जाता है। यदि र बाद में होतो पिछले अक्षर “क“ के नीचे “क्र” और “ट” के नीचे “ट्र” हो जाता है।
यदि किसी शब्द के अक्षर पर अनुस्वार (ं) हो तो अगला अक्षर जिस वर्ग का हो उस वर्ग के अंतिम व्यञ्जन जैसा अनुस्वार का उच्चारण होता है। जैसे —
अंकुर = अङ्कुर (कवर्ग का “ङ्”)
अंजली = अञ्जली (चवर्ग का “ञ्”)
अंडज = अण्डज (टवर्ग का “ङ्”)
अंदर = अन्दर (कवर्ग का “ङ्”)
अनुस्वार से अगला अक्षर पवर्ग या उसके बाद का हो तो, अनुस्वार का उच्चारण पवर्ग के अंतिम व्यञ्जन म् जैसा होता है।
संबंध = सम्बन्ध (पवर्ग का “म्”, तवर्ग का “न्”)
यदि किसी शब्द के अंतिम अक्षर पर अनुस्वार हो (अनुस्वार के बाद कोई अक्षर न हो) तो वह (ं) म् का उच्चारण करता है।
लेकिन इस मामले में अब कई दिक्कतें भी आती हैं क्योंकि मानक हिन्दी (लिखने) में भी ज्यादातर चन्द्रबिन्दु के स्थान पर अब अनुस्वार का प्रयोग होता है। इसलिए कई जगह पर “स” इत्यादि व्यञ्जनों के ऊपर अनुस्वार परेशान करता है। संसार को सन्सार बोलते है जबकि यहां अनुस्वार का उच्चारण म् होना चाहिए था। मंत्रों में परम्परा भेद के कारण भी कहीं-कहीं परेशानी होती है (शन्नो = शं नो)।
चन्द्रबिन्दु का उच्चारण भी कई प्रकार से सुनने को मिलता है, जहां बीज मंत्र की तरह दिया जाता है वहां इसका उच्चारण आमतौर से ँ = ं + ग् (श्रीँ=श्रीङ्ग) होता है। इसीलिए बहुत लोग सिंह (कुलनाम) को सिंघ बोलते हैं क्योंकि ंग् का “ग्” “ह” में मिलकर “घ” की ध्वनि करता है। जैसे निबाहना हो निभाना कहते हैं।
किसी व्यञ्जन का स्वर हटाने के लिए उसके नीचे हलन्त ( ् ) लगा देते हैं। बिना स्वर का व्यंजन अपने आप में पूर्ण और शुद्ध होता है लेकिन बोलचाल की भाषा में “म्“ को “आधा म“ कहते हैं। (यहां रूसी लिपि में उच्चारण देखें)