अमेरिका में आर्थिक संकट आया है तो अमरीकी डॉलर मंहगा क्यों हो रहा है? जब ये संकट शुरु हुआ था तब तो डॉलर टूटा था। डॉलर ४२ था धीरे-धीरे साढ़े ३९ हुआ था, मगर अब तो ५० से ऊपर जा चुका है। आज की तारीख़ में १ डॉलर ५०.२५ रुपये में बिक रहा है, ऐसा क्यों? जब डॉलर गिर रहा था, तब इसी कारण से तेल मंहगा हुआ था। फिर तो डॉलर के ५० पहुंचने पर तेल बहुत सस्ता हो जाना चाहिए?
यदि तंगी अमरीका में आई है, तो हम अपनी सुरक्षा के लिए अमरीकी डॉलर क्यों खरीद रहे हैं? ऐसे समय में तो हमें डॉलर बेचने चाहिए।
ग्राहकों की दुर्गती देखिये, जो बाजार ५०.२५ में १ डॉलर बेच रहा है, वही बाजार सिर्फ ४४.२५ में ग्राहकों से खरीद रहा है। खरीदने और बेचने के भाव में ६ रुपये का फ़र्क है, लेकिन यह अन्तर आमतौर से ५० पैसे का हुआ करता था। मतलब यह है कि बाजार डॉलर की हालत जानता है, ग्राहकों को दिख भी रहा है, फिर भी खरीद-खरीद कर भाव बढ़ाते जा रहे हैं।
वायदा कारोबार
वायदा कारोबार को देखिये, सोना चाँदी तो चलो पहले से था, इसमें आटा, दाल, चावल जुड़ते ही भारतीय ग्राहकों ने पूरी दुनिया के अनाज मंडियों की ऐसी की तैसी कर दी। दुनिया ने हम पर यह आरोप लगा दिया कि हम ज्यादा अन्न खाने लगे हैं, इसलिए दुनिया में अन्न मंहगा हो रहा है। भारत में जो गरीबों के लिए तंगी आई है, इसका कारण वायदा कारोबार ही है। वायदा कारोबार में ग्राहकों की यह हालत है कि जेब में दमड़ी नहीं और (वादे पर) माल ख़रीद-ख़रीद कर बाज़ार के भाव बढ़ाये जा रहे हैं। यदि किसी की दो-चार हजार की जमानत डूब भी जाती है तो अगले दिन एक की जगह चार नए ग्राहक बन जाते हैं। गाँव देहातों में वायदा कारोबार करने के लिए मोबाइल खरीदना पड़ता है, मगर शहरों में तो साइबर कॆफ़े महौल्ले में है।
एम॰ आर॰ पी॰
हमारे यहां हर उत्पाद पर “अधिकतम” विक्रय मूल्य (एम॰ आर॰ पी॰) छपा हुआ होता है। मैं समझता हूँ कि ऐसा उत्पाद बुद्धिमानों ग्राहकों के लिए नहीं हो सकता। होता यूं है कि, किसी उत्पाद का एम॰ आर॰ पी॰ तो १० रूपये है, लेकिन कहीं १० कहीं १२ तो कहीं १५ से २० रूपये तक में बिकता है। मैं बात हिन्दुस्तान के दो कोनों की नहीं कर रहा हूँ। एक ही शहर में अलग-अलग स्थान पर मूल्य में दोगुने का फ़र्क होता है। यदि एम॰ आर॰ पी॰ न भी छपा होता तब भी ऐसा ही होता, लेकिन तब वो उत्पाद कहीं ८ तो कहीं ९ में भी खरीदा जा सकता था। बुद्धिमान ग्राहक एम॰ आर॰ पी॰ १० होने पर भी ८-९ में ख़रीद लेते हैं, लेकिन आम जनता तो मूरख ही बनती है।