राजनीति नस्ल की
नस्लवाद (Racism)
एक बहुत पुरानी कहानी है। एक बहुत ही मामुली-सा आदमी जो आस्ट्रिया के एक छोटे में गाँव में जन्मा था; जर्मनी में रहा करता था। अपने विचारों के कारण वह सदैव विवादों में रहता था। वो जहां-तहां यहूदियों के खिलाफ बोलता रहता था। वह आदमी स्वयं ईसाई था और बोलता था यहूदियों के खिलाफ, इसलिए विवादित हो गया। लेकिन वो डरा नहीं, क्योंकि इस विवाद ने उसे वो चमक दी जिसके लिये वो हमेशा से ललायित था। उसने धर्म के मुद्दे को उछाला और इस धर्म के मुद्दे ने उस मामूली आदमी को इतना उछाला की जर्मनी की सर्वोच्च कुर्सी पर बिठा दिया। जल्दी ही वह और बहुत-सारे देशों का सम्राट बन गया। ईसाइयों ने अपने धर्म पर से कलंक मिटाने के लिए उस आदमी के युद्ध को नस्लवादी युद्ध कहा। हमारे इतिहासकार उस युद्ध को द्वितीय विश्व युद्ध कहते हैं और उस मामूली आदमी को हिटलर।
हिटलर की लड़ाई न तो धर्म की थी और न ही नस्ल की, लड़ाई थी सत्ता की। लेकिन, दुनिया भर के “गोरे (ईसाई) नस्लवादी” हिटलर को अपना आदर्श मानते हैं। और, स्वयं को राष्ट्रवादी कहते हैं। हिटलर को आदर्श मानने के कारण पूरी दुनिया में प्रबंधित हैं, लेकिन राष्ट्रवादी कहलाने के कारण स्थानीय पुलिस की छत्र-छाया सदैव बनी रहती है। हिटलर ने जर्मनी में बेराजगारी का इल्जाम यहूदियों पर लगा कर अपने युद्ध में नौजवानों (बेराजगार) का समर्थन हासिल किया था। इसलिए गोरे बेरोजगार हिटलर को आज तक अपना मसीहा मानते हैं। अनिवार्य सैनिक सेवा लौटने बाद जिन्हें काम नहीं मिलता वह स्वयं को राष्ट्रवादी कह कर कालों के खिलाफ अपराध करने लगते हैं। जैसे हिटलर ने अपनी पहचान बनाने के लिए अपनी मूछों को ख़ास स्टाईल का बनाया था, वैसे ही ये नस्लवादी सेना की अनिवार्य सेवा के बाद भी गंजे ही रहते हैं। गोरे-गंजे राष्ट्रवादी और काले-गंजे अपराधी कहलाते हैं। हालांकि यूरोप में केवल गोरे-गंजे ही होते होते हैं।
इस साल जो यूरो कप (फुटबॉल) हुआ, उसे नारा दिया गया था “नस्लवाद के खिलाफ”। उसी समय इटली में बंजारों (ख़ानाबदोश या जिप्सी) को देश से बाहर खदेड़ा जा रहा था। आज इतालवी लोगों को यह मानने में शर्म आती है कि रोमन भी बंजारे थे। जिन्होंने रोम को विश्व में स्थापित किया था। खैर, इटॆलियन लोगों को इन खेलों में शर्म का सामना नहीं करना पड़ा क्योंकि खेलों के आरम्भ में ही इटली की टीम हार कर बाहर हो गई।
रूस में तो कालों के साथ राहजनी, मारपीट और हत्या बहुत आम बात है। हत्या होने पर समाचार प्रकाशित हो जाते हैं। किसी विदेशी काले की हत्या अगर अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दा बन जाए तो दो-चार गंजों को गिरफ़तार करके एक-आध को एक-आध साल की जेल हो जाती है। लेकिन “नस्लवाद के खिलाफ” फुटबॉल में बड़ी शान से रूस ने कांस्य-पदक चूमा।
क्या सिर्फ कालों के खिलाफ गोरों का भेद-भाव ही नस्लवाद है? कुछ देशों में काले भी नस्लवादी हैं। कहा जा रहा है कि अमेरिका में नस्लवाद ख़त्म हो गया, क्योंकि अमेरिका में काला राष्ट्रपति बन गया। बराक हुसैन ओबामा की जीत का अर्थ यह नहीं है की अमेरिका में नस्लवाद समाप्त या कम हो गया है। हाँ, यह जरूर है कि वहां काले लोग बहुत ज्यादा हो गये हैं। क्योंकि, ओबामा का जो पसंदीदा रेस्टोरॉन्ट है वहां केवल काले ही खाना खा सकते हैं। मतलब नस्लवाद बर्करार है, क्योंकि ऐसे रेस्टोरॉन्ट को अपना पसंदीदा बनाना भी नस्लवाद ही है। लेकिन अब यह रेस्टोरॉन्ट बहुत चर्चित हो गया है तो, शायद कुछ गोरों को भी खाना खिलाने लगे।
जहां तक बात उम्मीदवार की काबलियत या योग्यता की हैं, इस मामले में जॉन मैक्कनि के आगे बराक ओबामा कुछ भी नहीं, आपने शायद इनकी बहस देखी हो या उम्र। यहां काबलियत पर नस्ल और धर्म ही भारी पड़े।
ओबामा की जीत का एक और कारण है, और वह यह कि डेमोक्रेटिव पार्टी के टिकट पर जो प्रतिद्वंद्वता करवाते हैं उसी दौरान उनके उम्मीदवारों को प्रयाप्त प्रचार मिल जाता है। इस बार बराक और हेलरी को खूब प्रचार मिला। यह जंग मॆक्’कैनी और ओबामा की तो थी ही नहीं। असली लड़ाई थी हेलरी और बराक की। इनमें से जिसको भी टिकट मिलता, वही जीतता। क्योंकि हेलरी के हारते ही ओबामा की विदेश यात्राएँ शुरु हो गईं। चुनाव से पहले भी ओबामा किसी देश में गया तो उसका स्वागत राष्ट्रपति की तरह ही हुआ, वहां पर ओबामा का भाषण भी राष्ट्रपति के भाषण की तरह ही हुआ।
यही तो डेमोक्रेटिव पार्टी की चाल है और, अब तो इन्होने अपने ऊपर से यहूदी समर्थक वाला ठप्पा भी हटा कर रिपब्लिकन पार्टी पर लगा दिया है। ओबामा का मुख्य नारा था परिवर्तन (we need change), हालांकि वो खुद सत्तारूढ़ दल का है और, कहता है कि आठ साल से आर्थिक स्थिति बिगड़ती जा रही है। इसी बात पर जॉन मैक्कैन ने उससे पूछा “चार साल पहले इसकी याद नहीं आई?” लेकिन, वोटरो ने सुना ओबामा कह रहा है परिवर्तन तो ओबामा के साथ हो लिये। वोटर पूरी दुनिया के मूर्ख हैं। वोटरों की यादास्त बिल्ली की तरह होती है, और मतदान की योग्यता पाँच-सात प्रतिशत लोगों के पास ही होती है।
जैसे भारत के पिछड़े क्षेत्रों में चुनाव प्रचारों के दौरान नेता लोग भीड़ जुटाने के लिए रंडियां और लौंडे नचवाते हैं, वही परमंपरा अमेरिका में है। और तो और जैसे किसी गुरु जी के सत्संग में लोग झूम-झूम कर नाचते-गाते हैं वैसे ही अमेरिका के चुनाव में उम्मीद के भाषणों में होता है। श्रोताओं को देखकर ऐसा लगता है कि मानो नेताजी भाषण नहीं कीर्तन गा रहे हों। क्योंकि भाषण के बाद उसी मंच पर किसी रंडी या लौंडा का नाच तय होता है।
नस्लवाद है और फिलहाल बना ही रहेगा। ओबामा तो फायदा उठा चुके अब औरों की बारी है। मेरे हिसाब से इस साल अमेरिका में हुए राष्ट्रपति चुनाव अंतिम शान्तिपूर्ण या व्यवस्थित चुनाव थे। इन चुनावों का परिणाम अगली बार आपको देखने को मिलेगा। ओबामा की जीत के कारण अमेरिका बिखर जाएगा। अगले चुनावों में शायद पूरे परिणाम न मिले लेकिन निटक भविष्य में इस देश के टुकड़े होना तय है।
धर्म या संप्रदाय के भेद-भाव से भी बुरी वस्तु है “नस्लवाद”, क्योंकि नस्ल को छिपाया नहीं जा सकता।