संघी-भाई
नया-नया जवान हुआ था, संघ वाले घर के चक्कर काटने लगे। सुबह हो या शाम, पवन जी! पवन जी! पवन जी! पवन जी!। मुझे पता चला कि संघ वाले आपस में एक-दूसरे को बिना जातिसूचक नाम के पुकारते हैं। किसी को पुकारने के लिए उसे “अमुक शर्मा/सिहं/गुप्ता/दास” न कहकर सिर्फ “फलाना जी“ कह कर पुकारते हैं। ये बात तो मुझे अच्छी लगी, लेकिन समस्या ये लगी कि किसी आदरणीय व्यक्ति को भला नाम लेकर कैसे पुकारें? क्योंकि हमारे पड़ोस के एक अंकल जी भी संघियों के घेरे में थे, मैं उनकी बहुत इज्जत करता था, मैं उनको अंकल जी कहता था, अब फलाना जी कैसे कहुँगा? सोचा ठीक है, अंकल जी को पुकारुंगा ही नही।
(कुछ दिन मैंने भी निक्कर डंडा थामा।)
लेकिन मुझे जब ये पता चला कि जिला स्तर तक के स्वयं सेवक ही इस बंधन में हैं, जिला स्तर और ऊपर के अधिकारी शर्मा/सिहं और वो सब जातिसूचक जो कभी सुने भी नहीं थे, सब कुछ जोड़ते हैं तो बहुत अफ़सोस हुआ। ये बातें चाहे जैसी करें, लेकिन हिन्दू संस्कृति और परंपरा का सबसे बड़ा दुश्मन राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ ही है।
इनकी हर हरक़त में ये झलकता है, जरा ध्यान से देखिए।
संघी वास्तव में वो आर्य-समाजी हैं जिन्हे अंग्रेजो के जमाने में धोती बांधने में शर्म आती थी। इसलिए आर्य समाज छोड़ कर संघी हो गए (आर्य समाजियों के अनुसार)। शुरु में तो पूरी तरह-से विश्वास नहीं हुआ, लेकिन जब ध्यान से देखा तो पता चला कि पुराने या कट्टर संघी वास्तव में निक्कर वाले आर्य-समाजी हैं।
(मैंने तो बड़ी मुश्किल से पीछा छुड़ाया, ईश्वर से सभी के कल्याण की प्रार्थना है।)