उदाहरण
हम लोग बातचीत में कई बार कुछ उदाहरण दे दिया करते हैं। इससे किसी को अपनी बात समझाना आसान हो जाता है। लेकिन उदाहरण केवल उदाहरण ही होते हैं। ये केवल दूसरी बात समझाने के लिए दिये जाते हैं। अपने आप में इनका कोई महत्त्व नहीं होता। लेकिन कुछ लोग इन उदाहरणों को भी बड़ी गंभीरता से ले लेते हैं। इसलिए उदाहरणो का इसतेमाल करना कोई अच्छी बात नहीं है। जहां इसकी बहुत जरूरत हो वहीं प्रयोग करना चाहिए और बहुत उचित उदाहरण देने चाहिएँ। बड़े-बड़े विद्वान अकसर अपनी बुद्धिमानी दिखाने के लिए अपनी बात कम और उदाहरण ज्यादा देते हैं। हालांकि मैं विद्वान तो नहीं फिर भी ऐसा करने जा रहा हूँ, क्योंकि शायद किसी का भला हो जाए, शायद कोई समझ जाए जो मैं कहना चाहता हूँ।
तुलसीदास जी मानस के आरम्भ में ही लिखते हैं कि “मूर्ख स्वयं गड्ढे में गिरकर तुम्हें उस गड्ढे से सावधान करता है“, आप बेशक मुझे धन्यवाद न दे कर महामूर्ख ही कहें लेकिन मैं आपको सावधान करना चाहता हूँ।
ओशो ने उदाहरण दिया था कि “यदि टूथ-पेस्ट को ट्यूब से बाहर निकाल दें तो वो वापस नहीं जा सकती” जिस समय उन्होने कहा था उस समय ये उदाहरण शायद ठीक था लेकिन आज नहीं। क्योंकि आजकल टूथ-पेस्ट पलास्टिक की ट्यूब में आती है। अगर आप से टूथ-पेस्ट कुछ ज्यादा निकल जाए तो आप उसे वापस डाल सकते हैं (आसानी से वॆक्यूम हो जाता है)। ओशो ने एक और उदाहरण दिया था कि “गर्भ में लड़का है या लड़की कोई नहीं बता सकता” ये पढ़कर तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ था, क्योंकि ये जानना तो हमेशा आसान था, ख़ास तौर से भारत में। आज थोड़ा-सा उल्टा है, भारत में ये जानना थोड़ा-सा कठिन है।
हम हिन्दू भाई अकसर अपने धर्म ग्रंथों से बहुत उदाहरण लिया करते हैं। हमारे धर्म ग्रंथों में भी एक-दूसरे के उदाहरण बहुत हैं। गीता के उदाहरणों का तो क्या कहना? वाह भई वाह… आजकल विद्वान लोग गीता का उदाहरण बहुत दिया करते हैं, जबकि गीता का उदाहरण तो किसी को देना ही नहीं चाहिए। क्योंकि अन्य ग्रंथों में तो प्रसंग, विषय या अध्याय बदलने पर परस्पर-विरोधी बातें देखने को मिलती हैं, लेकिन गीता में तो ऐसा लगता है जैसे कि हम कोई सुभाषितों का संग्रह पढ़ रहें हैं। जब गीता की बातें गीता में ही फिट नहीं बैटतीं तो उनका उदाहरण कहीं और कैसे लिया जा सकता है? भगवान् कृष्ण कहते हैं कि “अच्छे परधर्म से बुरा स्वधर्म श्रेष्ठ है, जो स्वधर्म का पालन करता है, वो पाप को प्राप्त नहीं होता“। इसी मामले में आगे कहते हैं कि “मेरा भक्त हो जा, मेरी पूजा कर, मुझे नमस्कार कर, मेरी शरण आ जा, सभी धर्मों का आश्रय छोड़ दे, मैं तुझे पापों से मुक्त कर दूंगा“। ये जो दो बाते भगवान् द्वारा कही गई हैं इनमें से पहली बात का उदाहरण लगभग सभी योग और आयुर्वेद की बात करने वाले देते हैं। वैद्य और योगी बाबा शायद कहना चाहते हैं कि कृष्ण ने अर्जुन को स्वधर्म पालन करनी वाली बात Jogging या Morning walk करते समय अर्जुन की कमजोर सेहत को देख कर बताई थी? जबकि यहां दोनो जगह धर्म का अर्थ धार्मिक आस्था या सम्प्रदाय से ही है।
लोग ये कहते हैं कि गीता सभी ग्रंथो का सार है, मैं समझता हूँ कि सार नहीं बल्कि “सार-संग्रह” है। बहुत-सी बाते अच्छी है पर बेमेल हैं। वैसे तो मैं साम्भर भी खा सकता हूँ, लेकिन उत्तर भारतीय होने के कारण यदि मुझे दाल, चावल, सब्जी, चटनी अलग-अलग कटोरियों में दी जाएँ तो ज्यादा बेहतर होगा। अगर पकाने वाले के पास अलग-अलग पकाने टाईम ही नहीं है तो कुक-बुक से काम चला लूँगा।
गीता कहती है कि आत्मा को किसी तरह कोई छति नहीं पहुंच सकती। गाँधी जी (मैं गाँधी जी के व्यक्तित्व और राजनैतिक दृष्टिकोण का समर्थक या प्रसंशक नहीं हूँ) कहते हैं कि शराब से आत्मा का नाश होता है। मेरा ज्ञान और अनुभव कहता है कि गाँधी जी सही हैं। इसका मतलब ये कि गाँधी जी भी गीता को सुभाषित की तरह ही पढ़ते होगें। वर्ना इतनी समझदारी वाली बात गीता प्रेमी कैसे कह सकता है। गीता प्रेमी बुरा न मानें, मैं आप लोगो की तरह प्रतिदिन गीता तो नहीं पढ़ सकता लेकिन मेरे मंदिर में गीता रखी है, मैं रोज पूजा जरूर करता हूँ।
विषय ही इतना घटिया है कि मैं लिखते-लिखते भटक गया।
लिखने चला था ‘उदाहरण’ पर और ‘कृष्ण’ पर अकट गया॥
तो चलो कृष्ण ही सही, भगवान् कृष्ण अर्जुन को धर्म युद्ध सिखाते रहे और खुद धर्म युद्ध से डर कर मथुरा छोड़ी, द्वारिका पलायन किया। स्वयं तो मातृ भूमि छोड़ी ही सारे कुटुम्ब-समाज पर मातृ भूमि छोड़ने का पाप लगया। पूरी दुनिया के योद्धाओं को महाभारत में भिड़ाया और अपने भाई और साले को इस यद्ध से बचाया। क्या कृष्ण के साले और भाई के लिए ये धर्म युद्ध नहीं था? क्या इन दोनो का इस युद्ध से कोई सम्बन्ध नहीं था? अर्जुन को स्वर्ग का झुठा लालच दिया, लेकिन दुर्योधन को स्वर्ग पहुंचाया और अर्जुन को नरक, क्या कृष्ण ने गीता में कसमें खा-खा कर इसी का वादा किया था? बात सीधी सी ये है जो बुज़ुर्ग लोग कहते हैं – राम ने रामायण में ये सिखाया कि हमें क्या करना चाहिए और कृष्ण ने महाभारत में शिक्षा दी कि हमें क्या नहीं करना चाहिए।
खांमखा की बात में चिट्ठा लम्बा हो गया, काम की बात वही पुरानी है कि उदाहरण ऐसा होना चाहिए जोकि भिवष्य में भी पूरा उतरे। जैसे मैंने उदाहरण के गड्ढे में गिरकर आपको सचेत करने का प्रयास किया, आप ऐसा न करें, जितना हो सके इससे दूर रहें।
Good Luck.
