॥श्री गणेशाय नमः॥

अगस्त 1, 2008

॥श्री गणेशाय नमः॥

मैं सबसे पहले श्री गणेश जी का स्मरण करते हुए इस ब्लॉग का शुभारम्भ तथा आपका स्वागत करता हूँ। श्री गणेशजी के ही एक अन्य रूप को मैं अपना इष्टदेव मानता हूँ, इसलिए उन्हें ऐसे समय पर प्रणाम करना और भी जरूरी है। और, इस ब्लोग का विषय भी कुछ ऐसा है कि इनकी सहयता के बिना एक कदम भी नहीं चला जा सकता। ऐसे समय में इनके भाई को भी याद करना जरूरी है, क्योंकि प्रज्ञा-पथ को वो सुगम-सुलभ करने में माहिर हैं। हमारे उत्तर भारत में गणेश जी के भाई कार्तिकेय जी (सुब्रामण्यम) की लोकप्रियता कुछ कम जरूर हैं लेकिन उनके प्रति हमारी श्रद्धा दक्षिण भारत वालों से कम नहीं है।

तो सबसे पहले गणेश जी (क्योंकि इस स्थान पर उनका अधिकार है) का स्तोत्र श्री सङ्कष्टनाशन गणेश स्तोत्र और फिर किर्तिकेय जी का श्री प्रज्ञा विवर्धनाख्यं कार्तिकेय स्तोत्र पढ़कर दोनों भाईयों का आशीर्वाद लें।

 

॥श्री गणेशाय नमः॥

श्री सङ्कष्टनाशन गणेश स्तोत्रम्

नारद उवाच।

प्रणम्य शिरसा देवं गौरी पुत्रं विनायाकम्।

भक्तावासं स्मरेन्नित्यम् आयुष्कामार्थसिद्धये॥१॥

प्रथमं वक्रतुण्डं एकदन्तं द्वितीयकम्।

तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतर्थकम्॥२॥

लम्बोदरं पञ्चमं षष्ठं विकटमेव च।

सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम्॥३॥

नवमं भालचन्द्रं दशमं तु विनायकम्।

एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम्॥४॥

द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः।

विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं परम्॥५॥

विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्।

पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम्॥६॥

जपेद्गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभेत्।

संवत्सरेण सिद्धिं लभते नात्र संशयः॥७॥

अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत्।

तस्य विद्या भवेत् सर्वा गणेशस्य प्रसादतः॥ ८॥

॥इति श्रीनारदपुराणे सङ्कष्टनाशनं नाम गणेशस्तोत्रं सम्पूर्णम्॥

 

॥श्री गणेशाय नमः॥

श्री प्रज्ञाविवर्धनाख्यं कार्तिकेय स्तोत्रंम्

स्कन्द उवाच।

योगिश्वरो महासेनः कार्तिकेयोऽग्निनन्दनः।

स्कन्दः कुमारः सेनानीः स्वामी शङ्करसम्भवः॥१॥

गाङ्गेयस्ताम्रचूडश्च ब्रह्मचारी शिखिध्वजः।

तारकारिरुमापुत्रः क्रौञ्चारिश्च षडाननः॥२॥

शब्दब्रह्म समुद्रश्च सिद्धः सारस्वतो गुहः।

सनत्कुमारो भगवान् भोगमोक्षफलप्रदः॥३॥

शरजन्मा गणाधीशपूर्वजो मुक्तिमार्गकृत्।

सर्वागमप्रणेता च वञ्छितार्थप्रदर्शनः॥४॥

अष्टाविंशतिनामानि मदियानीतियः पठेत्।

प्रत्यूषं श्रद्धया युक्तो मूको वाचस्पतिर्भवेत॥५॥

महामन्त्रमयानीति मम नामानुकीर्तनम्।

महाप्रज्ञामवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा॥६॥

॥ इति श्रीरुद्रयामले प्रज्ञाविवर्धनाख्यं श्रीमत्कार्तिकेयस्तोत्रं सम्पूर्णं॥

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(कृप्या ध्यान दें- इस ब्लॉग के पेजों पर कुछ मुख्य, महत्त्वपूर्ण या कठिन शब्दों को जब दोहराया गया है, तो जानबूझकर उनके वर्ण-विन्यास/हिज्जे भी बदल दिये गए हैं।)

A BRIEF INTRODUCTION TO VĀSTU

जनवरी 27, 2017

VĀSTU – VEDIC ARCHITECTURE
The Sanskrit word VĀSTU means a house with a corresponding plot of land. Place of living which can save us from rain, wind, hot, cold and wild animals etc. is called “VĀSTU”. We can’t apply rules of Vāstu on that house or Place of living that can’t save us from wind and rain.
Just walls, windows, pillars, doors and roof can’t be a god Vāstu. Only co-ordination of home with its people can make a favorable Vāstu. It gives energy to VĀSTU (house) and then Vāstu gives to us back.
“We shape our buildings; thereafter they shape us.”
– Winston Churchill
Environment has a great influence on our lives. When we change environment it changes our way of thinking and feelings. What would we react to what some extent it also depends on the environment. So, to improve our environment we should aware.
As the most of our time we spend in our home, environment of home should be maximum favorable. Home should be like that where we may feel comfortable and safe in each season. If we have harmony with our house and house has harmony with nature then we both will be energetic.
By keeping this in mind, sages gave place to Vāstu in the Vedas. Sthapatya Veda is the subdivision (up-Veda) of Atharva Veda. Vāstu is a famous name of Sthapatya Veda. This divine science of architectural building calls Vāstu or Vāstu Shastra.
The flow of energy is everywhere in the universe, in every live and in every object. How to control and make favorable these various forms of energetic flow has described in Vāstu. Vāstu teaches us how to make our harmony and balance with objects and the same time keep harmonious relation between different objects in our environment.
We are a part of our environment. If our environment is balanced we will feel balance too. As different organs harmoniously live in our body, the same way we should keep harmonious atmosphere around us. A healthy body has all organs healthy. If our house is healthy we will be healthier. According to Vāstu, land with healthy soil is considered appropriate for build house. So why, we should choose fertile, flat and attractive land.

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Pandit Pawan Kumar

जनवरी 9, 2011

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Pandit Pawan Kumar पंडित पवन कुमार

Jyotish Pandit (Vedic Astrologer) ज्योतिष पंडित

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Jyotish or Vedic Astrology

मई 3, 2009

Shri Ganeshay namah

You can read here Introduction to Jyotish or Vedic Astrology.

You can read here about planets.

And here about Ritu or Seasons.

about

विकास या उद्धार

मार्च 28, 2009

विकास या उद्धार
क्या हम वास्तव में विकासशील हैं? धर्मेन्द्र, जितेन्द्र, अमिताभ, विनोद खन्ना, सुनील दत्त, राज कुमार, राकेश रौशन, पृथ्वीराज कपूर, राज कपूर, मुकेश, किशोर, रफ़ी, दारा सिंह, हेमा मालिनी, माला सिंहा, सुचित्रा सेन, मुमुन सेन, नूतन इन सब में से किसकी औलाद इनसे खूबसूरती या योग्यता में बेहतर हैं? क्या सतयुग से त्रेता और त्रेता से द्वापर और द्वापर से कलयुग बेहतर है? यदि नहीं तो कहां विकास हो रहा है? (फिल्मी दुनिया का उदाहण इसलिए दिया क्योंकि फिल्मी दुनिया का हाल किसी से छिपा नहीं)
प्रकृति का पहला नियम है “परिवर्तन” लोग भ्रम वश इसे “विकास” समझ बैठते है।
दोष हमारा नही है, क्योंकि विकास तो कभी हुआ ही नही और न ही हो सकता है। यदि विकास हो रहा होता तो पहले कलयुग, फिर द्वापर, फिर त्रेता और फिर सतयुग आता। केवल सतयुग तक ही इस संसार का विकास हुआ था। पहला अवतार जलचर फिर उभयचर (जलचर/स्थलचर=कछुआ) फिर पशु फिर मनुष्य+पशु (नृसिंह) फिर नाटा मनुष्य फिर विकसित मनुष्य (ब्राह्मण) के रूप में अवतार हुआ।
जैसे-जैसे संसार में विकास हुआ वैसे-वैसे भगवान् भी विकसित अवतार लेते रहे।
सतयुग के बाद भगवान भी अधोगामी हो गए। ब्राह्मण के बाद क्षत्रिय और फिर वैश्य और उसके बाद नास्तिक रूप में भगवान आए। सुना है कि अगली बार शूद्र परिवार में जन्म लेने का विचार है। इसे आप विकास नहीं कह सकते। हाँ, यदि बहुत सकारात्मक दृष्टिकोण से देखें तो इसे उद्धार कह सकते हैं। इस संसार का विकास नहीं बल्कि उद्धार हो रहा है।

Vista home interface into English

मार्च 5, 2009

How to change the Window Vista interface language into English?

I want Vista interface in English.

Change Windows Vista into English.
……………
1. Run ‘Vistalizator’
(www.froggie.sk)
2. And give path for ‘Language Pack Installer’ lp-en-us_15ef57e54b23adc1672991ecacb8594f044b9c3d’
(www.microsoft.com)

यदि आप दुनिया के किसी अंग्रेजी न बोले जाने वाले देश में रहते हैं और आपने प्रीइंस्टॉल विस्ता होम सहित नया कंप्यूटर (लॆपटॉप / नोटबुक) खरीदा है तो आपको भाषा की समस्या होगी। उसमें पहले से स्थापित विन्डोज विस्ता होम बेसिक इंगलिश में नहीं होगा और आप उसके इंटरफेस अंग्रेजी में बदलना चाहते होंगे।
मैंने भी लॆपटॉप (नोटबुक) खरीदा था, वो भी गैर अंग्रजी भाषा में था। कहां-कहां धक्के नहीं खाए? हर जगह जवाब मिला कि यह असंभव है, नई विस्ता की सी.डी. खरीद लो या होम बेसिक को अपग्रेड कर लो। लेकिन आखिर कर एक बुद्धिमान ने मुझे http://www.froggie.sk का पता दिया। उनके यहां एक बहुत छोटा-सा 642KB का (मुफ्त) Vistalizator डाउनलोड करने के लिए मिलता है। और अंग्रेजी इंटरफ़ेस के लिए माइक्रोसॉफ्ट का लिंक मिलता है। वहां से, या सीधे माइक्रोसॉफ्ट से अंग्रेजी का यह लॆंगवेज पॆक इंस्टालर lp-en-us_15ef57e54b23adc1672991ecacb8594f044b9c3d डाउनलोड (256MBका) कर लें। बस आपका काम हो गया। यह बहुत ही सरल है।
1. Vistalizator को डबल क्लिक करके चला दें।
2. लॆंगवेज़ एड करने का ऑप्शन मिलेगा, बटन दबाकर lp-en-us_15ef57e54b23adc1672991ecacb8594f044b9c3d का रास्ता दिखाकर ओके कर दे।
ये काम दो-तीन मिनट पूरा हो जाएगा, फिर कंप्यूटर को रीस्टार्ट कर दें।
विस्वास करें काम हो जाएगा। और आप जब चाहें, बाद में अंग्रेजी इंटरफेस Vistalizator के द्वारा हटा भी सकते हैं।
सभी कहते हैं कि विस्ता होम और बिजनस के लिए अन्य भाषा से अंग्रेजी इंटरफेस बदलने का औजार माइक्रोसॉफ्ट के पास नहीं है। लेकिन यह सच नहीं है।

बुश पर बमों से हमला

दिसम्बर 22, 2008

“जो जूते बुश पर फेंके गए थे उन में संभवतः बम थे इसलिए उन जूतों को सुरक्षा कारणों से नष्ट कर दिया गया।”
यदि कोई अपराधी किसी हथियार से हमला करे तो, क्या कोर्ट के फैसले से पहले वह हथियार नष्ट किया जा सकता है? क्या ऐसा करना तर्क संगत या न्याय संगत है?
इसे कहते हैं इराक की सरकार पर अमेरिका का दबदबा।
पचास करोड़ की बोली वाले जूते अमरीकी राष्ट्रपति के सम्मान में नष्ट कर दिये गए। वर्ना वो देशभक्त जूते संग्राहलय की शोभा बनते और आगे चलकर अरबों में बिकते।
यदि बुश को भारत में जुतियाया गया होता तो, भारत सरकार भी बुश के सम्मान की रक्षा में तुरन्त जूते नष्ट कर देती। क्या इसमें किसी को कोई शक है?

शिष्ट नेता तथा समाचार संस्थाएं

दिसम्बर 13, 2008

समाचारों में बोला और लिखा जा रहा है….
1. मुम्बई हमलों के “सिलसिले में गिरफ़्तार” मोहम्मद अजमल अमीर क़साब….।
2. लश्कर-ए-तैबा के “कट्टरपंथी नेता”….।
3. जमात-उद-दावा “चरमपंथी संगठन”….।
4. अजमल अमीर क़साब वह एकमात्र “कथित” चरमपंथी है जो मुंबई “हमलों के बाद” पकड़ा गया….।
ऊपर लिखे चारो उदाहरण विश्व की सर्वश्रेष्ठ या सबसे भरोसेमंद समाचार संस्था के एक हिन्दी समाचार से लिए गए हैं।

जबकि “इस्लामवादी आतंकवदियों” इन हमलों में हमको यह साफ-साफ दिखा दिया कि हमलावर “इस्लामी आतंकवादी” थे और- ईसाई, यहूदी तथा हिन्दू उनका निशाना थे।

लेकिन हमारी सरकार, नेता और समाचार माध्यम (टी॰ वी॰, रेडियो, और प्रेस वाले) न जाने कब तक मुस्लिम आतंकवाद को “संगठन, गुट, कार्यकर्ता, नेता, हमलावर, कट्टरपंथी, अपहर्ता, आक्रमणकारी, बम विस्फोट करने वाले, बन्दी बनाने वाले अपराधी, अतिवादी, चरमपंथी, लड़ाके, गुरिल्ला, बन्दूकधारी, उग्रवादी, आपराधिक घटनाओं को अंजाम देने वाले, विद्रोही, अलगाववादी” और न जाने क्या क्या कहते रहेंगे। हद तो बहुत पहले हो गई थी, अब तो हद की भी हद हो गई।

आतंकवाद और पर्यटन

दिसम्बर 12, 2008

(Terrorism Vs Tourism : २६-२९ नवम्बर २००८, मुंबई। यह लेख २९ नवम्बर को इसी ब्लॉग पर पेज के रूप में प्रकाशित किया गाया था। लेकिन पाठक मित्रों का सुझाव है कि मैं इसे पोस्ट में प्रकाशित करूं, इसलिए इस लेख को मैं आज पोस्ट में प्रकाशित कर रहा हूँ।)

ये आतंकवादी हैं तो धर्म और राष्ट्र के आधार पर ही, लेकिन आज दुनिया की प्रत्येक वस्तु का व्यवसायिक करण हो गया है। यदि आतंकवादियों के लिए धर्म और राष्ट्र ही सब कुछ होता तो मुस्लिम देशों और मस्जिदों में आतंकवादी वारदातें न होती। पाकिस्तान के पाँच-सितारा होटल में भी धमाका न हुआ होता। एक धर्म और एक राष्ट्र जिस पर हम इल्ज़ाम लगा रहे हैं, वो इस हमले के लिए ‘जिम्मेदार’ तो हैं लेकिन ‘कारण’ नहीं है, कारण हैं ‘धन्धा’। “गन्दा है, पर धन्धा है ये।”

दुनिया के सभी धनी देशों में पर्यटकों की भरमार रहती है। या ऐसा कहें कि जिस देश में पर्यटकों की भरमार रहती है वह देश धनी हो जाता है। किसी भी देश की संपन्नता का विदेशी पर्यटकों से सीधा संबंध होता है। स्विट्जरलॆन्ड जैसे देश तो केवल पर्यटन के कारण ही धनी हुए। जब देश और उसकी सीमाएं सुरक्षित और शान्त हों तो रक्षा बजट घटता है और पर्यटक बढ़ते हैं। दुनिया का जो भी देश अशान्त व असुरक्षित होता है, वह गरीब हो जाता है। कोई पर्यटक पहले तो सिर्फ एक पर्यटक के रूप में देश को लाभ पहुंचाता है, लेकिन आगे चलकर वो निवेशक भी बनता है।

इस हमले का उद्देश्य भारत में पर्यटकों को आने से रोकना था। यूरोप के पर्यटक गर्मी के मौसम में तुर्की और मिश्र ज्यादा जाते हैं, इस लिए वहां गर्मियों में आतंकवादी हमले होते रहते हैं। हालांकि दोनो ही मुस्लिम देश हैं। इस प्रकार के हमले अकसर सैलानियों के मौसम से कुछ पहले होते हैं, मौसम के बीच में नहीं। जैसा कि इस बार मुम्बई में हुआ।

मुस्लिम आतंकवाद के पोषक तत्त्व पर्यटकों का रुख दुबई की ओर करवाने के लिए हमले करवाते हैं। इसलिए दुबई में आतंकवादी घटनाएं नहीं होती, तभी तो दुनिया भर के अमीर (आराम-पसंद) पर्यटक दुबई में आराम करते हैं। इसी महीने वहां एक नया होटल खुला है, जिसके एक कमरे के एक दिन का कियारा है ढ़ाई लाख रुपये (पाँच हजार यू॰ एस॰ डॉलर)। इस होटल के उद्घाटन पर बीजिंग ऑलम्पिक समारोह से तीन गुना अधिक आतिशबाजी हुई।

पर्यटन के धन्धे वाले लोग केवल आतंकवादी हमले ही नहीं करवाते, पाकृतिक आपदाएं और महामारियां (महामारियों की अफ़वाहें) भी भिजवाते हैं। अब यह गुप्त रहस्य भी नहीं है कि जिस जहाज से आतंकवादी आये थे पहले तो वह चोरी हुआ फिर पाकिस्तानी तट-रक्षकों द्वारा पकड़ा गया। इसके बाद जहाज को सउदी अरब ले जाया गया, सउदी अरब से जहाज ने सफर शुरू किया और, कराची से आतंकवादियों को लादा तब जाकर मुंबई पहुंचा।

पर्यटन की दृष्टी से भारत दुनिया की एक आदर्श भूमि है। यह भूमि पूरी दुनिया के पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है, लेकिन डर के मारे अमीर पर्यटक भारत नहीं आते। आज की हालत देखकर लगता है कि मध्यम और इकॉनामी श्रेणी वाले पर्यटक भी अब आने से घबराएंगे।
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दूसरे पहलु
जैसे अमेरिका ने आतंकवादी हमले के जवाब में अफ़गानिस्तान या ईराक पर हमला किया, हम पाकिस्तान पर नहीं कर सकते। जब अमरीका की आर्थिक स्थिति इससे चरमरा गई तो हमारा क्या होगा? हल तो फिर भी नहीं निकला।

हम अपने नेताओं को भी दोषी नहीं ठहरा सकते, क्योंकि हमने ही उन्हें चुन कर कुर्सी पर बिठाया है। मतलब, नेता लोग जो भी कर रहे हैं हमारे समर्थन से ही कर रहे हैं। यदि नेता दोषी हैं तो, हम उनसे भी ज्यादा दोषी हैं।

सबसे बड़ा दुःख इस बात का है कि जितने आतंकवादी मरे उससे डेढ़ गुणा सुरक्षाकर्मी मारे गए। इसके लिए हमारा सिस्टम जिम्मेदार है। हमें सैनिकों के समर्थन में आन्दोलन करना चाहिए। सैनिकों के हथियार व सुरक्षा उपकरण और बेहतर होने चाहिए।

जब हमला हिन्दु और यहुदियों पर हुआ तो सिर्फ मुसलमान ही क्यों, ईसाइयों को भी तो फ़ायदा होना चाहिए। वो कहते हैं न, किसी बिचारे का घर जला तो पड़ोसी आग में रोटियां सेकने लगे।
इस हमले और शोर-शराबे का फायदा नेता मिडिया और सरकार ने ख़ूब उठाया, लेकिन लगता है सिर्फ दैनिक भास्कर वालों को ही चर्च से फंड नहीं मिलता। इसीलिए ऐसी ख़बर छाप दी… http://www.bhaskar.com/2008/11/29/0811291602_church_blast.html चर्च धमाकों में पकड़े गए ११ या १२ लोगों को मौत की सजा और ११ या १२ लोगों को ही उम्रकैद।

जैसे फिल्म वाले माहौल देख कर फिल्म रिलीज़ करते हैं, वैसे ही न्यायाधीश भी माहौल देख कर निर्णय सुनाते हैं। मुंबई धमाकों के अपराधियों को जब सजा मिली तो सबने हल्ला काटा। क्या प्रेस, क्या नेता, दुसरी कोई ख़बर तो थी ही नहीं। आज वो प्रेस कहां है? मुंबई धमाकों में अदालत ने जितना समय लिया उससे आधे समय में ही चर्च के अपाधियों को सजा मिल गई। अब देखते हैं कि मुंबई के इस हमले में जो एक आतंकवादी जिंदा बच गया है उसे मौत की सजा कब मिलेगी?